अष्टाध्यायी सूत्रपाठ - डॉ. रमाशंकर मिश्र / Ashtadhyayi Sutrapath - Dr. Ramashankar Mishra - भारतीय संस्कृतप्रभा

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Tuesday, June 29, 2021

अष्टाध्यायी सूत्रपाठ - डॉ. रमाशंकर मिश्र / Ashtadhyayi Sutrapath - Dr. Ramashankar Mishra

 अष्टाध्यायी सूत्रपाठ - डॉ. रमाशंकर मिश्र / Ashtadhyayi Sutrapath - Dr. Ramashankar Mishra





अष्टाध्यायी सूत्रपाठ - डॉ. रमाशंकर मिश्र / Ashtadhyayi Sutrapath - Dr. Ramashankar Mishra
Ashish Choudhury


अष्टाध्यायी सूत्रपाठ - डॉ. रमाशंकर मिश्र :-


पुस्तक का नाम - अष्टाध्यायी / Ashtadhyayi
रचयिता - पाणिनि
संकलन - डॉ. रमाशंकर मिश्र
विषय - संस्कृत व्याकरण
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अष्टाध्यायी सूत्रपाठ परिचय : -
                                      अष्टाध्यायी (अष्टाध्यायी = आठ अध्यायों वाली) महर्षि पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का एक अत्यंत प्राचीन ग्रंथ (7०० ई पू) है।[1] इसमें आठ अध्याय हैं; प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं; प्रत्येक पाद में 38 से 220 तक सूत्र हैं। इस प्रकार अष्टाध्यायी में आठ अध्याय, बत्तीस पाद और सब मिलाकर लगभग 4000 सूत्र हैं। अष्टाध्यायी पर महामुनि कात्यायन का विस्तृत वार्तिक ग्रन्थ है और सूत्र तथा वार्तिकों पर भगवान पतंजलि का विशद विवरणात्मक ग्रन्थ महाभाष्य है। संक्षेप में सूत्र, वार्तिक एवं महाभाष्य तीनों सम्मिलित रूप में 'पाणिनीय व्याकरण' कहलाता है और सूत्रकार पाणिनी, वार्तिककार कात्यायन एवं भाष्यकार पतंजलि - तीनों व्याकरण के 'त्रिमुनि' कहलाते हैं।
अष्टाध्यायी छह वेदांगों में मुख्य माना जाता है। अष्टाध्यायी में 3155 सूत्र और आरंभ में वर्णसमाम्नाय के 14 प्रत्याहार सूत्र हैं। अष्टाध्यायी का परिमाण एक सहस्र अनुष्टुप श्लोक के बराबर है। महाभाष्य में अष्टाध्यायी को "सर्ववेद-परिषद्-शास्त्र" कहा गया है। अर्थात् अष्टाध्यायी का संबंध किसी वेदविशेष तक सीमित न होकर सभी वैदिक संहिताओं से था और सभी के प्रातिशरूय अभिमतों का पाणिनि ने समादर किया था। अष्टाध्यायी में अनेक पूर्वाचार्यों के मतों और सूत्रों का संनिवेश किया गया। उनमें से शाकटायन, शाकल्य, अभिशाली, गार्ग्य, गालव, भारद्वाज, कश्यप, शौनक, स्फोटायन, चाक्रवर्मण का उल्लेख पाणिनि ने किया है।


अष्टाध्यायी का समय : -
                               अष्टाध्यायी के कर्ता पाणिनि कब हुए, इस विषय में कई मत हैं। भंडारकर और गोल्डस्टकर इनका समय 7वीं शताब्दी ई.पू. मानते हैं। मैकडानेल, कीथ आदि कितने ही विद्वानों ने इन्हें चौथी शताब्दी ई.पू. माना है। भारतीय अनुश्रुति के अनुसार पाणिनि नंदों के समकालीन थे और यह समय 5वीं शताब्दी ई.पू. होना चाहिए। पाणिनि में शतमान, विंशतिक और कार्षापण आदि जिन मुद्राओं का एक साथ उल्लेख है उनके आधार पर एवं अन्य कई कारणों से हमें पाणिनि का काल यही समीचीन जान पड़ता है।

Author of pages: - Ashish Choudhury

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